िारतीर् ज्ञान परिंपरा िें र्ोग एविं सािना पद्दमत (जैन दियन के मविेर्ष सिंदिय िें)

Authors

  • डॉण् नेहा जैन अशसण् प्रोण् समाजशास्त्रए पंशित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय मशहला स्नातकोिर महाशिद्यालयए लखनऊ Author

Keywords:

प्रेक्षाध्यानए ज्ञानयोगए कायोत्सगयए सामामयकएयोगिान दशयनयोगए चररत्रयोग

Abstract

भारतीय अध्यात्मिादी परंपरा में योग साधना का अमस्तत्ि अमत प्राचीन काल से ही रहा है । हडलपा और मोहनजोदडो की खुदाई में ध्यान मुद्रा में जोमगयो के अंकन पाए जाते हैं ।औपमनषमदक ऋमषगण और िमण.साधक अपनी िैमदक जीिनचयाय में योग साधना को स्थान देते रहे हैं । िुि और महािीर को ज्ञान का जो प्रकाश उपलब्ध हुआ िह उनकी योगए ध्यानए साधना का ही पररणाम था । प्रेक्षाध्यान और मिपश्यना जैन एिं िौि परंपराओं की उन्हीं पिमतयों के आधुमनक रूप है । इसी योग समामध के द्वारा िैमदक काल में मकतने ही ब्रह्मउपासक मंत्रदृिा ऋमष िन गए मजनका प्रमाण िेद की ऋचाएं हैं । सूत्रकृतांग .सूत्र जैसे सिसे पुराने जैन धमय ग्रंथो में योग और ध्यान का उपयोग संयम या संयम के अभ्यास को संदमभयत करता है मजसे योगिान द्वारा मूतय रूप मदया गया है। योगिान िह व्यमक्त है मजसके पास संयम है और जो ज्ञानयोग दशयनयोग और चररत्रयोग में आमधकाररक है।

References

Published

2024-09-30