गुप्तकालीन साहित्य तथा कला में नृत्यरत नारियाँ
Abstract
भारतीय इतिहास में गुप्तवंश का शासन अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। गुप्तकालीन शांति एवं सुव्यवस्था के वातावरण में साहित्य तथा कला को विकसित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। साहित्य और कला में ‘नारी’ को एक महत्वपूर्ण प्रतिमान के रूप में स्थान मिला है। देवी मूर्तियों के अतिरिक्त लौकिक जीवन की विभिन्न भूमिकाओं का निर्वहन करती हुई स्त्रियों का प्रचुर अंकन हुआ है। इसमें नृत्य एवं संगीत में रत नारियां विशिष्टतया अंकित की गयी हैं जिनमें रूप, भाव तथा भंगिमाओं का सुंदर समन्वय दिखायी देता है। प्रस्तुत शोधपत्र में गुप्तकाल में साहित्य तथा कला दोनों ही क्षेत्रों में ‘नृत्यांगना’ रूप में नारी चित्रण के उदाहरणों को एकत्रित करने का प्रयास किया गया है।
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Published
2014-09-29
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Articles