कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ग्राम्य संघटन

Authors

  • डाॅ0 आयशा फातमी एसोसिएट प्रोफ़ेसर - प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, नारी शिक्षा निकेतन स्नातकोत्तर महाविद्यालय,लखनऊ Author

Keywords:

कौटिल्य, अर्थशास्त्र, ग्राम, संघटन, सहकारिता

Abstract

मानव की सामूहिक तथा संघीय गतिविधियों ने ही एक संगठन के रूप में ग्रामों का विकास किया है। भारत में भी अति प्राचीन काल से ही स्थानीय सहकारी संगठनों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं। भारत की ज्ञात सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता सैन्धव सभ्यता में अन्नागारों, स्नाानागारों तथा गोदी आदि पुरातात्विक साक्ष्यों की प्राप्ति से सैन्धव जीवन में संघीय तत्वों के प्रमाण मिलते हैं। वैदिक संस्कृति निश्चित रूप से ग्रामीण संस्कृति थी । ऐसा प्रतीत होता है कि प्राक्वैदिक आर्येत्तर भारतीयों से निरन्तर संघर्ष के कारण सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से वे समूहों में रहते थे और प्रारम्भ में भूमि पर उनके कबीलों का सामूहिक अधिकार था। परवर्ती वैदिक कालीन आर्थिक जीवन के पर्याप्त विकास के साथ-साथ वैश्यों में ”गण” अथवा ”संघ” की व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है जो ब्राह्मण तथा क्षत्रियों की धार्मिक तथा राजनैतिक संघटक प्रवृत्तियों से अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। संभवतः असुरक्षा और आपसी सहयोग की आवश्यकता आदि कारणों से कुछ लोग कार्य/व्यवसाय मिलकर करने लगे थे और दूर देशों की यात्राएँ प्रायः समूहों में करते थे। लम्बी दूरियों और असुरक्षित सड़कों को पार करने के लिये वे एक ‘निकाय‘ के रूप में संगठित होकर कठिनाइयों का सामना कर सकते थे। वैदिक और बौद्ध साहित्य में प्रयुक्त ग्राम, ग्रामणी, ग्रामभोजक सभा, गण, पूग आदि शब्दों से ग्रामों में संघटक प्रवृत्तियों के स्पष्ट संकेत मिलते हैं तथा पुरातात्विक साक्ष्यों से इस तथ्य की पुष्टि भी हो जाती है। ग्रामों में शिल्पियों के अस्तित्व और संगठन के प्रमाण भी वैदिक साहित्य में मिलते हैं जहाँ ‘श्रेष्ठि‘ और ‘गण‘ शब्द बार-बार प्रयुक्त हुआ है। बौद्ध साहित्य में श्रेणियों की संख्या 18 बताई गई है। प्राचीन भारतीय ग्रामों में संघीय तत्वों के दर्शन राजनीतिक क्षेत्र में भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। राजा के चुनाव तथा कार्यप्रणाली में ग्रामीणों का महत्वपूर्ण योगदान था। वैदिक ग्राम्य जनों की प्रार्थनाओं और हार्दिक कामनाओं में भी संघीय तत्व परिलक्षित होते हैं। पूग‘ और ‘गण शब्द संभवतः ग्रामों तथा नगरों के स्थानीय संगठनों के लिये प्रयुक्त किया जाता था। अतः स्पष्ट है कि कौटिल्य के पूर्व भी ग्रामों में संघटक प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से क्रियाशील थीं तथा ग्रामवासियों के क्रियाकलाप सहकारिता की भावना पर आधारित थे। यद्यपि कौटिल्य का समय साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों के विकास का युग था तथा शक्ति के केन्द्रीकरण पर बल दिया जा रहा था। राज्य के समस्त कार्य शासन के स्पष्ट नियन्त्रण में थे तथापि स्थानीय संगठनों में संघटक तत्व भी पूर्णतया परिलक्षित होते हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र यद्यपि मुख्यतः उत्तम शासन तथा आर्थिक व्यवस्था का विवरण प्रस्तुत करता है, तथापि इससे हमे तत्कालीन संघीय गतिविधियों का भी ज्ञान प्राप्त होता है। प्रस्तुत शोध पत्र में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्राचीन भारत के ग्रामों में पायी जाने वाली संघीय गतिविधियों एवं संघटनात्मक प्रवृत्तियों का अध्ययन करने की चेष्टा की गई हैं ।

References

Published

2016-09-29