अथर्ववेद के परिप्रेक्ष्य में समुद्र तत्त्व की पयअथर्वर्ववेदेद परिप्रेक्ष्ेक्ष्य ें समुद्रुद्र्र ार्ववरणीय अवधारणा
Keywords:
अथर्ववेद, पर्यावरण, जल।Abstract
मनुष्य, जीव स्थावर-जन्म आदि पदार्थों के चारो ओर आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि व्याप्त हैं। सम्पूर्ण भू-मण्डल इन पंच तŸवों से आवृŸा है। इन पंच भौतिक तŸवों से आवृत्त रहने के बाद ही जीव अपने अस्तित्त्व को धारण करने में समर्थ होता है। जीवन में प्रकृतिभूत जिन तŸवों का विशेष रूप में प्रभाव देखा जाता है, वे सभी तŸव पर्यावरण के रूप में परिगणित होते हंै। आदिकाल से ही मानव जीवन का प्रकृति से घनिष्ठतम् सम्बन्ध रहा है। जिस प्रकार प्रकृति पंच महाभूतों का वृहद् समन्वय है, उसी प्रकार मानव का शरीर भी इन्हीं पंच महाभूतों से निर्मित है और उसका पर्यवसान भी इन्हीं तत्त्वों में ही होता है। आधुनिक मानव अपने जीवन को भौतिक सुखों से युक्त करने के लिए प्राकृतिक सम्पदाओं का आवश्यकता से अधिक दोहन कर रहा है। जिसके दुष्परिणाम सम्पूर्ण सृष्टि को भोगने पड़ रहे हैं। इन भौतिक सुखों से मानव जितना सुखी और सम्पन्न हो रहा है, उससे कहीं अधिक आन्तरिक दृष्टि से दुःखी होता जा रहा है।
अथर्ववेद में पर्यावरणीय घटकों का भण्डार है,जिनमें समस्त प्राणिवर्ग का कल्याण निहित है। इन तŸवों में इस जगत् के अनेक प्रकार के विशेष रत्नों को समुद्र अपने गर्भ में समाहित किये हुए है। सŸार प्रतिशत से अधिक सतह समुद्र के खारे पानी से व्याप्त है। समुद्र पृथ्वी पर पर जलवायु को संयमित करने, भोजन और आक्सीजन प्रदान करने, जैव विविधता को बनाये रखने और परिवहन के क्षेत्र में अपनी विशेष भूमिका का निर्वहन किस प्रकार करता है एवं उसके प्रमुख घटक कौन-कौन से हैं? इन सभी बिन्दुओं को शोधपत्र में समाहित करने का प्रयास किया गया है।