वर्तमान में शिक्षा, स्वास्थ्य और योग दर्शन
Abstract
भारतीय समाज में भौतिकता की चका-चैध से शायद ही कोई अछूता हो, चाहे ग्रामीण क्षेत्र हो या नगरीय, सभी में आधुनिकता की स्पष्ट झलक व्यक्ति की वेशभूषा, खानपान, रहन सहन, भाषा शैली, इत्यादि में भारतीय एव पाश्चात्य संस्कृति के रूप में देखी जा सकती है या यूं कहें कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक क्षेत्र इससे पूर्णतया आकर्षित हैं। प्रत्येक सामाजिक वर्ग तीव्रता के साथ आधुनिक जीवन शैली को अपनाकर आनंदित व प्रफुल्लित हो रहे हैं। इस भ्रम में कि वह समृद्धि व प्रगति की दिशा में अग्रसर हैं। पर शायद वह अपनी ऐसी दृष्टि के कारण समाज को उस दशा व दिशा में परिवर्तित कर रहे हैं। जहां व्यक्ति जीवन मूल्यों के साथ-साथ उसके शरीर व मन पर भी दुष्प्रभाव तनाव, भगनाशा, और अशांति, जैसे मनोविकारों के रूप में देखा जा सकता है। जो लोगों में स्वास्थ संबंधी समस्याओं में वृद्धि कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए प्रयास किए जाने आवश्यक है। नित्य नए रोगों का जन्म दवाओं से अधिक होने के कारण स्वस्थ रहने के अन्य उपाय भी व्यक्ति के लिए आवश्यक समझे जा रहे हैं। विभिन्न चिकित्साओ यथा मनोचिकित्सा, औषधि चिकित्सा, आहार चिकित्सा, रस चिकित्सा, अंतः स्रावी चिकित्सा, यांत्रिक चिकित्सा, जीव चिकित्सा, स्नान चिकित्सा, शल्यकर्म इत्यादि के अतिरिक्त भारत में प्रचलित अन्य चिकित्साओ जैसे एलोपैथ, आयुर्वेद, और यूनानी, योग, रोगनिरोधन को अपनाकर रोगों का उपचार व निदान किया जा रहा है। इनमें योग को रोग की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण समझा जा रहा है जो कि न केवल रोगों के उपचार के साथ साथ मानसिक रोगों के निदान में अधिक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। ओषधि से ‘तन’ तो ‘मन’ को ‘योग’ द्वारा साधने व स्वस्थ रखने का प्रयास किया जा सकता है। मानसिक अस्वस्थ्यता को दूर कर मानसिक स्वास्थ्य एवं विकास की दिशा में योग शिक्षा द्वारा निम्नांकित कार्य किये जा सकते हैं। योग द्वारा व्यक्ति की चिंता, तनाव, संघर्ष व शिथिलता को भी दूर किया जा सकता है। योग क्रियाओं के माध्यम से स्नायु मंडल, मेरुदंड, और मन मस्तिष्क को स्वस्थ सजग और उसे पुष्टता प्रदान की जा सकती है। जिससे मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि की जा सके। शारीरिक और मानसिक व्याधिओ को दूर करने में योग शिक्षा का विशेष योगदान हो सकता है।