पिं० दीनदर्ाल उपाध्र्ार्ः एक िैमक्षक व्र्मित्व

Authors

  • किलेि मसिंह अशसस्टेंट प्रोफेसरए शशक्षक शशक्षा शिभागए बुन्देलखण्ि महाशिद्यालयए झाुँसी। Author
  • डॉ० बाबूलाल मतवारी पूिि प्राचायिए बुन्देलखण्ि महाशिद्यालयए झाुँसी। Author

Keywords:

जीरो ्लिए शालेय मशक्षाए एकात्म मानििादए सममन्ित दृमिकोण

Abstract

पंमडत दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 मसतंिर 1916 राजस्थान प्रान्त के जयपुर.अजमेर रेलिे लाइन पर मस्थत धनमकया नामक रेलिे स्टेशन में हुआ था। पंमडत जी जि 2 िषय 6 माह के थे तभी उनके मपता भगिती प्रसाद का स्िगयिास हो गया। 6 िषय के होते.होते माँ िीमती रामलयारी क्षयरोग से ग्रस्त होकर भगिान को लयारी हो गयी। अल्पायु में ही पंमडत जी से माँ का साया जाता रहा। पंमडत जी की औपचाररक मशक्षा.दीक्षा अपने मामा राधारमण जी शु्ल के साथ गंगापुर मसटी में हुई। िह िचपन से ही कुशाग्र िुमि के थे। पंमडत दीनदयाल उपाध्याय के शैमक्षक व्यमक्तत्ि की स्पि झलक उनके द्वारा रमचत मिमभन्न ग्रन्थों ि उनके कृमतत्ि से ममलती है। समाज के मलए मशक्षा की महिा मकतनी हैए उनके द्वारा स्थामपत ष्जीरो ्लिष् से लगाई जा सकती है। जीरो ्लि का उददेश्य परीक्षा में शून्य अंक लाने ि कमजोर ि मपछडें छात्रों की सहायता कर उन्हें िरािरी के स्तर पर लाना था। पंमडत जी मशक्षा को समाज के मिकास का सिोिम साधन मानते थेए उनका मानना था मशक्षा ही मकसी भी राष्र के मनमायण की चािी है। मकसी भी राष्र का मनमायण उसके नागररकों पर मनभयर करता है और िे सभी नागररक ममलकर समाज का मनमायण करते है।
पंमडत जी का मानना था सभ्य समाज का मनमायण पररष्कृत मशक्षा प्रणाली द्वारा ही मकया जा सकता है सामामजक मशक्षाए अन्त्योदयए एकात्म मानि आमद प्रत्ययों का सृजन उनके शैमक्षक व्यमक्तत्ि की झलक मानस पटल पर गहरे से छाप छोडती है। पंमडत जी औपचाररक मशक्षा ;शालेय मशक्षाद्ध के साथ.साथ अनौपचाररक ;समाज के द्वाराद्ध मशक्षा को भी उतना ही महत्िपूणय मानते थे ्योंमक सामामजक मशक्षा के द्वारा ही व्यमक्त में संस्कारों ि मूल्यों का िीजारोपण आसानी से मकया जा सकता है। पंमडत जी मजहिी आधार पर मशक्षा के स्िरूप के मनमायण के मिरोधी थे मिशेषतः ईसाई ममशनररयों द्वारा चलाई जाने िाली संस्थाओं को देश के मलए उन्होनें खतरनाक िताया। पंमडत जी मशक्षा को देश की उन्नमत का सिोिम उपकरण मानते थेए इसमलए िह मशक्षा को औपचाररक ि अनौपचाररक दोनो माध्यमों से देने के पक्षधर थे। सामामजक ि व्यमक्तगत मशक्षा संस्कृमत ि मूल्यगत नैमतक मशक्षाए निमनमायण की मशक्षाए भौमतकिाद का अध्यामत्मकता से जुडाि की मशक्षा से युक्त समाज के मनमायण के स्िलनदृिा से थे पंमडत जी। पंमडत दीनदयाल उपाध्याय जी मिज्ञान और संस्कृमत के सममन्ित स्िरूप को ही समाज के पुनमनयमायण का आिश्यक तत्ि मानते है और आगाह करते है ष्हम सम्पूणय मानि के ज्ञान और उपलमब्धयों का संकमलत मिचार करें।ष् पंमडत दीनदयाल उपाध्याय जी के व्यमक्तत्ि ि कृमतत्ि से समझा जा सकता है मक िह भारतीय मशक्षा प्रणाली में व्यमक्तगत ि सामामजक मशक्षाए भौमतक ि आध्यामत्मक मशक्षाए भौमतक ि िैज्ञामनक मशक्षा एिं आडम्िर मिहीन मशक्षा के सममन्ित दृमिकोण के पोषक थे।

References

Published

2024-09-30