श्री अरविन्द और पं0 दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्रिाद की अिधारणा का 21 िीं सदी में उपादेयता
DOI:
https://doi.org/10.67088/veethika/v16.i2.38Keywords:
प्रस्तुत र्ोध पत्र में वनम्न प्रश्नों पर ध्यान केवन्ित वकया गया है 1. राष्रिाद की अिधारणा और स्िरुप क्या है ? 2. भारतीय राष्रिाद, पविमी राष्रिाद से वकस प्रकार वभन्न है ? 3. राष्रिाद की आध्यावत्मक अिधारणा क्या है ? 4. श्रीअरविन्द का राष्रिाद और पुं० दीनदयाल के राष्रिाद में समानता और अुंतर क्या है ? 5. इन दोनों के राष्रिाद की ितशमानयुग में क्या प्रासुंवगक है ?Abstract
श्री अरविन्द और पंवित दीनदयाल उपाध्याय की िैचाररकी का भारतीय पुनवनिमािण में महत्िपूणि अिदान है। इन दोनों ने भारतीय राष्ट्रिाद की पविम देशों की तरह मात्र एक राजनीवतक आंदोलन नहीं, िरन् एक एक गहन और आध्यावत्मक और सांस्कृवतक अिधारणा के रूप में स्िीकार वकया है। श्री अरविन्द का राष्ट्रिाद आध्यावत्मक और पं0 दीनदयाल उपाध्याय का, राष्ट्रिाद सांस्कृवतक है। श्री अरविन्द राष्ट्र की एक जीिंत शवि के रूप में देखते हैं, वजसका आधार उनका समग्र अद्वैतिाद है। जबवक पं0 दीन दयाल उपाध्याय के अनुसार राष्ट्र का आधार वचवत और संस्कृवत है जो उनके एकात्म मानिबाद पर अिलवबबत है। इन दोनों का राष्ट्रिाद उनके तत्िमीमांसा आधार का प्रवतफलन है जो अपने स्िरूप में भारतीयों की केन्रगत रखता है और अपनी व्यापकता में मनुष्ट्य और राष्ट्र के सामूवहक कल्याण उत्थान पर बल देता है इस शोध पत्र में इन दोनों के राष्ट्रिाद का तुलनात्मक अध्ययन वकया जाएगा। साथ ही यह वदखाने का प्रयास वकया जाएगा वक यह पविमी राष्ट्रिाद से वकस प्रकार वभन्न है।
बीज शब्द राष्ट्रिाद, वचवत, समग्र अद्वैतिाद एकात्म मानितािाद ।