पूर्वमीमाांसा में शब्द का नित्यत्र्ानित्यत्र्
DOI:
https://doi.org/10.67088/veethika/v16.i2.36Keywords:
पूवयमीमांसा,, वेद,, र्ब्द णनत्य,, र्ब्द ऄणनत्य।Abstract
वेदों की प्रामाणिकता एवं प्रणतपाद्य को स्थाणपत करने के णिए अचायय जैणमणन ने पूवयमीमांसा दर्यन की रचना की। उन्होंने ऄपने दर्यनर्ास्त्र के ऄन्तगयत र्ब्द की णनत्यता तथा ऄणनत्यता को सूत्र र्ैिी में बहुत ही ताणकयक और युणिपूवयक प्रस्तुत णकया है। उन्होंने र्ब्द के ऄणनत्यत्व का खण्डन करके णनत्य को स्थाणपत णकया है। मीमांसकों के ऄनुसार विय यानी क, ख, ग जैसे ऄक्षर और उनसे बने र्ब्द णनत्य हैं। उनका कभी नार् नहीं होता। हम जब बोिते हैं तो र्ब्द को उत्पन्न नहीं करते केवि प्रकट करते हैं। र्ब्द का उच्चारि ऄथायत् ध्वणन ऄणनत्य है। वह उत्पन्न होती है और नष्ट हो जाती है। िेणकन विय रूपी र्ब्द सदा अकार् में णवद्यमान रहता है । र्ब्द ऄथय सम्बन्ध भी णनत्य है। जैसे गाय र्ब्द और गाय रूपी पर्ु का सम्बन्ध णकसी ने बनाया नहीं। यह सम्बन्ध स्वाभाणवक और सनातन है। आसणिए वेद ऄपौरुषेय हैं ऄथायत् णकसी मनुष्य ने नहीं बनाए। ऄगर र्ब्द और उसका ऄथय ऄणनत्य होता तो वेदों के मंत्रों का ऄथय हर काि में पररवणतयत हो जाता। धमय का ज्ञान णनणित नहीं रहता। आसणिए पूवयमीमांसा दर्यन र्ब्द को णनत्य मानकर वेदों का स्वतः प्रमाण्य णसद्ध करता है। पूवयमीमांसा का यह णसद्धान्त मुख्यतः वेदों की णनत्यता और धमय ज्ञान की णस्थरता बचाने के णिए है। आस र्ोध पत्र के माध्यम से पूवयमीमांसा दर्यन में उपिब्ध र्ब्द के णनत्य ऄणनत्य णवषय को समझाने का प्रयास णकया जायेगा।