वैििक सािहत्य में ििव का स्वरूप और उनकी उपासना
DOI:
https://doi.org/10.67088/veethika/v16.i2.35Keywords:
विव ,दिवाषमय, के िी ,कपवदनष ् ,, ,उपासना ,स्वरूप ,उपावध ,उपवनर्द ् ,ब्राह्मिउन्थ ,वेद ,प्तर , वृर्भ, महावभर्क् , िवै वाद आवद। ,वदवोवाराह ,ववंवंसक ,्यम्ेक्Abstract
भारतवर्ष वववभन्न धावमषक परम्पराओं एवं आस्था की पृष्ठभूवम है। वेद इन परम्पराओं की ज्ञानगङ्गा एवं सुदृढ साक्ष्य के रूप में प्रवतवष्ठत हैं। वेदों में इन्र प्तर आवद िनेकों दवे ताओ ंके स्वरूप प्रारु ,ववष्ि ु ,िवग्न ,होते हैं। कालान्तर में ववष्िु सयू ष आवद दवे ,प्तर ,
प्तर को ेंनसामान्य में देष्ठ दवे ों के रूप में प्र वलत हवए। इनमें से सेसे िवधक मयावत दवे प्तर दवे को प्रारु हवई। वैवदक सावहमय में
उउ, ेलवान एवं कल्यािकारी देवता के रूप में व वित वकया गया है वेंसकी उपासना ेंङ्गलों एवं पवषतों में रहने वाली ेंावतयों द्वारा की ेंाती थी। प्तर की उपासना वैवदक यज्ञों, मन्िपाठ तथा स्तुवतयों से होती थी। प्तर ही आगे लकर विव कहलाए तथा इनके भक्तों द्वारा िनुपावलत धमष िैवधमष कहलाया। विव - स्वरूप द्वन्द्वाममक है। यह ववनािक क ेे साथ ही सृवि के पालक एवं रक्षक भी हैं। वे रोगनािक वैद्य के रूप में भी पूेंे ेंाते हैं। उपवनर्दों में प्तर को परब्रह्म के रूप में प्रवतवष्ठत वकया गया है। विव को ब्रह्मा - ववष्िु
की एकाममता के साथ महेिर भी कहा गया है। वैवदक काल में विव को एक प्तर तथा िनेक प्तर दोनों रूपों में देखा गया, परन्तु वह एक ही परम तत्त्व ब्रह्मस्वरूप है। वैवदक सावहमय में विव का स्वरूप प्रा ीन भारतीय धम ष को दिाषता ह।ै यही आग े लकर )प्तर(
- तत्त्व का आधार ेना। विव की उपासना वैवदक यगु स े वनरन्तर प्रववहत िैवधमषदिनष परम् पिराविक विवपरा की नींव है। यह वतषमान में भी प्तरावभर्ेक, विव - स्तोि तथा महामृमयुदेंय आवद मिों के रूप में ेंीववत है। प्रस्तुत िोधपि में वैवदक सावहमय में प्रारु
विव के वववभन्न स्वरूपों का वववे न तथा िैवधमष के कालर्म की ववस्तृत एवं साक्ष्यपरक ाष की ेंाएगी।