वृहत्संहिता का अध्याय ‘दृकार्गल’ः प्राचीन भारत में भूगर्भ जल की खोज का अनूठा दस्तावेज
Abstract
जीवन के लिये जल एक अनिवार्य पदार्थ है। मनुष्य के जीवन तथा वनस्पति की उत्पत्ति हेतु हमें नदियों, तालाबों तथा कुओं से जल प्राप्त होता है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही भारतीय मनीषियों ने जीवन की इस परम और अनिवार्य आवश्यकता का अनुभव कर भूगर्भ के जल का पता लगाने के अनेक प्रयास और प्रयोग किये थे। उन लोकहितार्थ प्रयोगकर्ता विद्वानों ने अपने अनुभव लिपिबद्ध किये होंगे परन्तु वे सब उपलब्ध नहीं हैं। इस विषय का जो ग्रन्थ मुद्रित उपलब्ध होता है वह आचार्य वराहमिहिर की वृहत्संहिता है। इस ग्रन्थ का 53वाँ अध्याय ‘दृकार्गल’ है। इसमें भूभर्ग के जल का ज्ञान करने, पता लगाने की विधि बताई गई है। वराहमिहिर ने इस विज्ञान को दृकार्गल कहा है, जिसका अर्थ है भूमि के अंदर के जल (दक) का लकड़ी की छड़ी (अर्गला) के माध्यम से निश्चय करना, पता लगाना। यह कला देश के अनेक भागों मे अब भी काम में लायी जाती है। वराहमिहिर से पूर्व भी इस विषय के कई विद्वान भारत में हुए जिनके ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं है। वराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ में स्वयं सारस्वत और मनु का उल्लेख किया है। वराहमिहिर के समय तक न केवल लकड़ी की छड़ी अपितु वनस्पति, मृदा, पाषाण, जीव-जन्तुओं और रत्नों के द्वारा भी पानी की खोज में सहायता ली जाती थी, पानी के स्वाद और मात्रा का ज्ञान भी कर लिया गया था तथा उन्होंने अशुद्ध पानी को शुद्ध करने के उपाय भी बताए हैं। वनस्पति विज्ञान, भू-विज्ञान और प्राणिकी विज्ञान को उन्होंने अपनी जल की खोज का आधार बताया है। प्रस्तुत शोध पत्र में वराहमिहिर के भूगर्भ जल की खोज के महती प्रयासों और प्रयोगों और उनमें प्रयुक्त वैज्ञानिक विधियों पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही वर्तमान में उसकी आवश्यकता तथा प्रासांगिकता पर विचार किया गया है।