मनुष्य के जीवन में शिक्षा का महत्त्व

Authors

  • डाॅ0 प्रशान्त सिंह प्रवक्ता, इतिहास विभाग, वी0एस0पी0एस0 महाविद्यालय, कानपुर Author

Keywords:

आध्यात्मिक ज्ञान, विद्यार्जन, सच्चरित्रता, आत्मसंयम, आत्मचिन्तन।

Abstract

भारतीय समाज में प्राचीन काल से शिक्षा अथवा विद्या का स्वरूप अत्यन्त ज्ञानपरक, सुव्यवस्थित और सुनियोजित था, जिसमें व्यक्ति के लौकिक और पारलौकिक जीवन के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा प्रदान की जाती थी। भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के निर्माण तथा विभिन्न उत्तरदायित्वों को निष्पन्न करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य के व्यक्तित्व का उत्कर्ष होता था। विभिन्न प्रकार के निर्देशों, संयमों और नियमों से मनुष्य का जीवन सुव्यवस्थित होता था, जिससे उसके व्यक्तित्व का विकास होता था। शिक्षा-प्राप्ति से ही व्यक्ति विभिन्न कत्र्तव्यों का पालन कर सकने मंे सफल होता था। इससे उसके भीतर आत्म-संयम, आत्म-चिन्तन, आत्मविश्वास, आत्म-विश्लेषण, विवेक-भावना, न्याय-प्रवृत्ति और आध्यात्मिक वृत्ति का उदय होता था। शिक्षा और विद्या के माध्यम से सामाजिक और सांस्श्तिक जीवन का उत्कर्ष होता है। शिक्षा से ही अतीत की संस्श्ति वर्तमान में जीती है तथा पहले से चली आती हुई परम्पराएँ जीवन्त हो उठती हैं। 

References

Published

2017-09-29