महिलाओं की शिक्षा सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन

Authors

  • श्वेता मिश्रा Author

Keywords:

स्त्री, शिक्षा, संचार।

Abstract

ज्ञानं मनुजस्य तृतीय नेत्रं" वेदो में ज्ञान को मनुष्य के तृतीय नेत्र की संज्ञा दी गई है क्योकि जहाँ ज्ञान मनुष्य को संसार भर की विशिष्ट सूचनाओं के भण्डार से परचित कराता है वहीं यह मनुष्य को समानता, स्वतंत्रता, न्याय जैसे आवश्यक मूल्यों के उपयोग एवं अपने अधिकारों के प्रयोगों के माध्यम से समाज का एक योग्य नागरिक बनने में सहयोग करता है। ज्ञान के अर्थ को वर्तमान में शिक्षा के पर्याय में ग्रहण किया जाता है। शिक्षा मनुष्य को शिक्षित करने का काम करती है तो दुसरी ओर यह समाज में होने वाले परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढाल लेती है। समाज में सबकी अपनी भाषा, रहन-सहन, खान-पान का ढंग, मान्यता एंव विश्वास होता है। जिसके आधार पर शिक्षा की नीव रखी जाती है। इसी कारण जैसा समाज होता है, वैसी शिक्षा होती है और जैसी शिक्षा होती है, वैसा ही समाज होगा। स्त्री समाज का आधार कही जाती है यदि नींव ही कमजोर होती है तो भवन कैसे शक्तिशाली हो सकता है। यदि स्त्री ही शिक्षित नही है तो वह आने वाली पिढ़ी को सही मार्गदर्शित नही कर पाती है जिससे कि समाजिक विकास नही हो सकता ।
गांधी जी ने कहा था कि स्त्री ईश्वर की श्रेष्टतम रचना मानते है। उन्हानें इस बात को स्पष्ट किया था कि पुरुष व स्त्री का कार्य क्षेत्र थोड़ा भिन्न है लेकिन उनकी संस्कृति समान होती है, इसलिए स्त्री पुरूष दोनों को ही समान शिक्षा व जनसंचार के अवसर प्रदान किये जाने चाहिए। भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू जी ने कहा था कि "परिवार में लड़के की शिक्षा एक ही सदस्य की शिक्षा होती है परन्तु परिवार में लड़की की शिक्षा सम्पूर्ण परिवार की शिक्षा होती है। विगत वर्षों में घर से बाहर स्त्री की भूमिका देश के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गयी है। इस दृष्टिकोण से स्त्रियों के प्रशिक्षण व रोजगार की समस्या पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। चिकित्सा, शिक्षण और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में स्त्री महत्वपूर्ण योगदान दे रही है परन्तु यह केवल शहरों तक ही सीमित है। गावों में आज भी स्त्री शिक्षा एवं संचार को उचित रूप से सही दिशा नही मिल रही है।

References

Published

2019-09-29