रामचन्द्र की शुक्लोत्तर हिन्दी आलोचना का स्वरूप एवं विकास
Keywords:
प्रभाववादी आलोचना, स्वच्छंदतावादी आलोचना, मार्क्सवादी या प्रगतिवादी आलोचना, मनोवैज्ञानिक अथवा अंतश्चेतनावादी आलोचना, अनुसंधानपरक आलोचना, ऐतिहासिकया सांस्कतिक आलोचना, व्याख्यात्मक आलोचना, नई समीक्षा ।Abstract
डॉ० रामचन्द्र शुक्ल वर्तमान हिन्दी आलोचना साहित्य के क्षेत्र में जिस लोकमंगल समन्वित रसवाद की प्रतिष्ठा की और व्यवहारिक स्तर पर जिस विवेचन विश्लेषण पद्धति की शुरूआत की उसने परवर्ती आलोचकों को भी न्यूनाधिक रूप में प्रभावित किया। शुक्ल जी से पूर्व हिन्दी आलोचना की परम्परा विशेष समृद्ध नहीं थी आचार्य शुक्ल ने उसे एक स्थिर सुदृढ़ और प्रौढ स्वरूप प्रदान किया किन्तु परवर्ती आलोचकों के लिए इस परम्परा को उससे आगे ले जाना अथवा उसमें दिशा परिवर्तन करना एक कठिन चुनौती थी। आचार्य शुक्ल का व्यक्तित्व परवर्ती आलोचकों के समक्ष एक चुनौती के रूप में खड़ा था "किन्तु अपने पूर्ववर्ती आलोचना साहित्य की तुलना में शुक्ल जी का आलोचक व्यक्तित्व जितना विराट लगता है, उतना परवर्ती आलोचकों के सामने नही।"
आचार्य शुक्ल की सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक समीक्षा दोनों का समापन लगभग 1940 के आसपास हो जाता है और सन 1960 के आसपास समीक्षा के विकास का एक नया युग प्रारम्भ होता है। आचार्य शुक्ल के निबंध 'कविता क्या है', 'काव्य में रहस्यवाद तथा 'काव्य में अभिव्यंजनावाद' तथा उनके 'साहित्येतिहास ग्रंथ' हिन्दी साहित्य का इतिहास में स्थापित कई मान्यताओं पर परवर्ती आलोचना में अनेक विवाद सामने आए। नन्ददुलारे वाजपेयी, सा० डॉ० नगेन्द्र तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के रूप में आलोचकों की एक बृहत्रयी शुक्ल जी के ही समय में सक्रिय थी।