श्रीवत्स ला´छन भट्ट्टाचार्य प्रण््रणीत काव्यपरीक्षा में ें रस विवेचेचन
Keywords:
काव्यशास्त्र, काव्यदोष, रसAbstract
काव्यशास्त्रीय विवेच्य विषयों में दोष का महत्त्वपूर्ण स्थान है। आचार्य भरतमुनि से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तकके आचार्यों ने काव्य में दोष परिवर्जन को आवष्यक माना है। अपदोषता स्वयं एक महत्त्वपूर्ण गुण है। ‘‘अपदोषतैव विगुणस्य गुणः’’ दोष काव्य में अपकर्षक होते हैं। काव्य में एक भी दोष नहीं होना चाहिए क्योंकि काव्य में दोष उपेक्षणीय नहीं है, जैसे सुन्दर मुख में थोड़ा सा भी कुष्ट उसकी सुन्दरता को नष्ट कर देता है, वैसे ही काव्य में दोष उसकी सरसता को नष्ट कर देता है। काव्य में रसानुभूति या आनन्दानुभूति में विघातक तत्व को ‘दोष’ कहा जाता है। इस प्रकार रस-प्रतीति के विघातक उद्वेगजनक तत्त्व दोष कहलाते हैं। यहाँ ‘रस’ शब्द से भाव, रसाभास और भावाभास आदि का भी ग्रहण होता है। अतः रस-भावादि के
अपकर्षक ही दोष कहलाते हैं। अर्थात् जिससे रसादि की सम्यक् अनुभूति में बाधा होती है वही दोष है। प्रस्तुत शोधपत्र में काव्यपरीक्षा में वर्णित रसदोषों का निरूपण करने के साथ-साथ व्यभिचारिभाव, रस, स्थायीभावों का स्वशब्द द्वारा कथन, विभाव, अनुभाव की कष्ट कल्पना द्वारा अभिव्यक्ति, प्रतिकूल विभावादि का ग्रहण, रस की पुनः-पुनः दीप्ति अवसर पर रस का विस्तार, रसच्छेद, अंग रस का अधिक विस्तार, प्रधान रस का विस्मरण, प्रकृति-विपर्यय और अनंग प्रकृत रस के अनुपकारक होने पर सम्यक् दृष्टिपात् किया गया है।