भारत द्वीप का सामाजिक संघ्ंघटन

Authors

  • डाॅ0ॅ0 प्रेर्रेरणा माथुरुर सहायक आचार्य, प्राच्य संस्कृत विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय Author

Keywords:

भारत द्वीप, संघटन

Abstract

संस्कृत साहित्य अपनी गरिमा के लिए केवल भारत में ही नहीं अपितु समस्त संसार में विख्यात है। महाकवि वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भारवि, भवभूति आदि साहित्यकारों की साहित्यिक सम्पदा को सभी देशों के विद्वानों द्वारा सम्मान एवं मान्यता प्रदान की गयी है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में सामाजिक संघटन का वर्णन अनेक ग्रन्थों में प्राप्त होता है। इस संघटन का वर्णन करते समय जिन नैतिक आदर्शों तथा सामाजिक उदाŸा भावनाओं तथा समाज संरचना का चित्रण किया गया है वह प्राणिमात्र के लिए प्रेरणादायक है। प्रस्तुत शोधपत्र में भारतद्वीप में सामाजिक संघटन को ही समझने का प्रयास करते हुए समाज और मनुष्य का सम्बन्ध, वर्तमान जगत् के समाज विज्ञान और प्राचीनतम समाजविज्ञान की पृथकता का विवेचन, आर्य जाति के समाजविज्ञान के अनादि, स्वाभाविक और पूर्ण होने के अकाट्य कारण, तथा आध्यात्मिक उन्नतिशाील आर्यजाति को तपन से दग्ध न होने देने के लिए वर्णाश्रम का महŸव आदि का सम्यक् विवेचन किया गया है। इसके साथ-साथ बीज और क्षेत्र रूप से नर और नारी का होना,क्षेत्र की पवित्रता की विशेष
 प्रयोजनीयता, वर्णाश्रम का कल्पद्रुम रूप से वर्णन आदि विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है।

References

Published

2020-09-29