स्त्री विरोध्ेधी विचार एवं बौद्ध साहित्यः एक मूल्ूल्यांकंकन

Authors

  • डाॅ0ॅ0 वन्दना सन्त एसोसिएट प्रोफेसर, प्रा0 भा0 इ0 एवं पु0 नारी शिक्षा निकेतन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लखनऊ Author

Keywords:

आठ गुरू धर्म, भिक्खुनी, श्रामणेरी, उपसम्पदा प्रवारणा, अर्हत्व, बोधिसत्व

Abstract

छठी शताब्दी ईसा पूर्व का कालखण्ड एक क्रान्तिकारी युग था। इस समय विविध क्षेत्रों में परिवर्तन दिखायी पड़ते हैं। सामाजिक क्षेत्र भी इससे अछूता न रहा। कई महत्वपूर्ण बदलाव समाज में आए। इनमें से एक विशेष परिवर्तन है समानता पर आधारित समाज की स्थापना की परिकल्पना का होना। जन्म, वर्ण, जाति-पांति, लिंग के आधार पर असमानता का खण्डन किया गया। यद्यपि बौद्ध साहित्य में स्त्रियों के प्रति समुचित आदर प्रदर्शित किये जाने के प्रमाण उपलब्ध होते हैं तथापि कतिपय विवरणों में स्त्रियों के प्रति असमानता सम्बन्धी विचार भी प्राप्य हैं। कुछ स्थानों पर स्त्रियों पर चरित्रहीनता का आरोप भी लगाया गया है। एक तरफ स्त्रियों को धम्म एवं संघ में सम्मिलित होने का अधिकारी स्वीकार किये जाने, माता-पत्नी-पुत्री के रूप में सम्मान की अधिकारिणी माने जाने, राजनीति, सम्पत्ति एवं शिक्षा में उनके अधिकार को स्वीकार किये जाने के अनेक उदाहरण मिलते हैं तो दूसरी तरफ स्त्री को पुरूष के समक्ष कमतर आंकने, उसे भोग्या अथवा दासी समझने, स्त्री द्वारा व्यभिचार किये जाने, उसके स्वभाव की चंचलता एवं चित्त की अस्थिरता सम्बन्धी विवरण भी प्राप्त होते हैं। प्रायः यह माना जाता है कि गौतम बुद्ध स्त्री की समानता सम्बन्धी विचारों के पक्षधर थे। ऐसे मंे बौद्ध साहित्य में विरोधी विचारों का मिलना निश्चय ही गंभीर चिंतन का विषय है। प्रस्तुत शोध पत्र में इसी प्रकार के विचारों को उद्घाटित करने के उपरान्त उनका मूल्यांकन करने का प्रयास किया गयाा है।

References

Published

2020-09-29