समकालीन महिला लेखिकाआंे के उपन्यासों मंे नारी संघर्ष
Keywords:
पितृसत्तात्मक, दोहरा मापदण्ड, अस्मिता, पूंजीवादी व्यवस्था, उपभोक्ता मूलक ंसंस्कृति।Abstract
सामाजिक संदर्भ में मनुष्य एवं साहित्य का संबंध अत्यंत व्यापक है। इसमें स्त्री केन्द्रबिन्दु है, वह जन्मदात्री है, सृष्टि को गति देने का कार्य करती है। प्राचीनकाल मंे अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, तारा, गार्गी, मैत्रेयी, अनुसूया जैसी तेजस्वी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। हजारों वर्षों तक उनके साथ पशुवत् व्यवहार किया गया। देश-दुनिया के फलक पर कई महत्वपूर्ण सुविधाओं की आड़ मंे स्त्री शोषण का नया रूप सामने आया है। स्त्री व साहित्य विमर्श की जब पड़ताल की जाती है तो ऐसा प्रतीत होता है कि नारी का अस्तित्व अनादि काल से संषर्घ एवं समर्पण के बीच झूलता रहता है। स्वाधीनता के बाद उनकी सामाजिक एवं पारिवारिक स्थिति मंे बदलाव आना शुरू हुआ। इसी के साथ नारी का अपना संघर्ष बढ़ा भी है। 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक नारी पुरूष मुख से बोलती थी, 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से नारी ने समाज के अनेक क्षेत्रों में पहचान बनानी शुरू की। पुरूष के कातर अंह के कारण नारी की स्थिति आज भी सुदृढ़ नहीं बन पायी है। समकालीन हिन्दी महिला लेखिकाआंे विशेषकर कृष्णा सोवती, मन्नू मण्डारी, उषा प्रियंवदा, प्रभा खेतान, मैत्रयी पुष्पा, चित्रा मुदृगल ने अपनी रचनाओं मंे स्त्री संघर्ष को चित्रित किया है।