रवीन्द्रनाथ टैगोर का बालसाहित्य

Authors

  • डॉ० सुरेन्द्र विक्रम एसो० प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ Author

Abstract

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कालजयी कृति गीतांजलि के इतनी अधिक भाषाओं में अनुवाद हुए हैं कि यह लोगों की जुबान पर चढ़ी हुई है। बांग्ला भाषा में आज भी इसकी सर्वाधिक स्वीकृति है।यह सुखद है कि टैगोर ने बच्चों के लिए भी महत्वपूर्ण साहित्य लिखा है जिसकी भूरि-भूरि सराहना हुई है। बांग्ला भाषा में आज भी मान्यता है कि कोई लेखक तब तक बड़ा नहीं माना जाता है, जब तक वह स्वस्थ और सार्थक शिशु साहित्य ( बांग्ला में बालसाहित्य की जगह शिशु साहित्य प्रयोग होता है) का सृजन नहीं कर लेता है। प्रस्तुत आलेख में रवीन्द्रनाथ टैगोर के बालसाहित्य पर अनेक कोणों से विहंगम दृष्टि डालने का प्रयास किया गया है।उनकी कविताओं, कहानियों और नाटकों में किशोर वर्ग की मूलभूत आवश्यकताओं को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। बच्चों का वृहत्तर परिवेश उनकी रचनाओं में न केवल सार्थक हुआ है अपितु उन्हें नई दृष्टि देने में भी टैगोर पूरी तरह सजग और सचेत रहे हैं।

References

Published

2021-09-29