भारत में हिन्दू स्त्री के वैधानिक अधिकार

Authors

  • डाॅ० नीलिमा गुप्ता एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, बी०एस०एन०वी० पी० जी० कालेज, चारबाग लखनऊ Author

Keywords:

हिन्दू स्त्री, अधिकार, कानून।

Abstract

भारत में, स्त्रियों की उच्चकोटि की विद्वता से लेकर रणक्षेत्र तक गौरवशाली इतिहास रहा है। ईसा पूर्व 300 से लेकर ईस्वी सन के प्रारम्भ तक भारत में कठोर सामाजिक परिवर्तन हुये। जिससे स्त्रियों की स्थिति में भारी गिरावट आई। मनुसंहिता से कात्यायन एवं शुक्र के समय तक, ईस्वी सन के प्रारम्भ से छटीं या सातवीं शताब्दी तक सम्पत्ति से सम्बन्धित कानून के इतिहास में व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा स्त्री सम्पत्ति स्त्री धन के विकास दर्शन होते है। सम्भवतः प्राचीन- हिन्दू विधि- निर्माताओं ने संयुक्त परिवार की सम्पत्ति को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से स्त्री को सम्पत्ति की विरासत से वंचित रखा। औपनिवेशिक भारत में पहली बार 1874 में विवाहित स्त्री सम्पत्ति सम्बन्धित अधिनियम द्वारा विवाहित स्त्री को अर्जित आय पर अधिकार की स्वीकृति मिली जो एक क्रान्तिकारी परिवर्तन था। यद्यपि स्त्रियों को सती प्रथा निषेध एक्ट द्वारा मिलें जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये एक के बाद एक, एक दूसरे के पूरक एक्ट बनाये गये। जैसे विधवा विवाह, शारदा एक्ट, बाल विवाह निषेध एक्ट बनाये गये, जो स्त्रियों को सामाजिक जीवन में सम्मान पूर्वक उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने एक के बाद एक स्त्री की स्तिथि सुधारने एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिये एक्ट बनायें। वास्तव मेें सरकार द्वारा पारित कानून व्यवहारिक होने की अपेक्षा सैंद्धान्तिक अधिक हैं। क्योंकि व्यवहार में भारतीय स्त्रियां उन अधिकारों से अभी भी वंचित हैं। ये कानून छाया बनकर रह गये है।

References

Published

2021-09-29