मंदिर निर्माण की नागर, द्रविड़ व वेसर शैलियाँ तथा उनकी विशेषताएँ

Authors

  • आकंाक्षी मिश्रा शोध छात्रा, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ Author

Keywords:

मंदिर, नागर, द्रविड़, वेसर, विश्वकर्मा, मय, मयमत, स्थापत्य-कला, उत्तरापथ, दक्षिणापथ, आर्य, अनार्य, प्रासाद, विमान, गर्भगृह, शिखर, आगमग्रन्थ और समरांगणसूत्रधार।

Abstract

गुप्तोत्तर काल में सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच में मंदिरों के नवीन रूप का विकास हुआ जिसमें मंदिर वास्तु ने ऊपर को उठते हुए शिखर का रूप धारण कर लिया था। ये मंदिर आकार-प्रकार और निर्माण-शैली की दृष्टि से भिन्न-भिन्न हैं। देश, काल, सम्प्रदाय तथा रुचि के कारण मंदिरों की बनावट में विभेद मिलता है। भारत में प्रासादों के निर्माण की प्रक्रिया जिस रूप में प्रारम्भ हुई तथा जिस क्रम में उसका विकास होकर उसे सैद्धान्तिक स्वरूप प्राप्त हुआ, यह सम्पूर्ण प्रक्रिया बड़ी जटिल एवं क्लिष्ट है, ऐसी स्थिति में उससे पर रहते हुये अभीष्ट प्रयोजन के प्रसंग में यहां इतना निदर्शन करना पर्याप्त है कि मध्य-युग तक आते-आते भारत में प्रासाद निर्माण की प्रक्रिया ने सुव्यवस्थित स्वरूप प्राप्त किया तथा विविध रूपाकारों में भारत के कई भागों में विविध प्रकार के प्रासाद निर्मित हुये। प्राचीन भारतीय शिल्पशास्त्रों जैसे-मानसार, मयमत, समरांगणसूत्रधार, ईशानशिवगुरुदेवपद्धति, मानसोल्लास, कामिकागम, सुप्रभेदागम और शिल्परत्न आदि में मन्दिर निर्माण की विभिन्न शैलियों का उल्लेख मिलता है। इनमें तीन शैलियाँ प्रमुख हैं-नागर, द्रविड़ और वेसर। मंदिर स्थापत्य की नागर शैली का सम्बन्ध उत्तर भारत, द्रविड़ शैली का दक्षिण भारत तथा वेसर शैली का सम्बन्ध दक्कन क्षेत्र से है। इन शैलियों के मन्दिरों में क्षेत्रीय विभेद व विशेषताएँ भी देखने को मिलती हैं।

References

Published

2026-04-22