पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य की शैक्षिक अवधारणा (एक विश्लेषणात्मक अध्ययन)
Abstract
विज्ञान ने जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है, शिक्षा भी उससे अछूती नहीं रही है। तथापि शिक्षा के उद्देश्य एवं स्वरूप के निर्धारण के लिए उसे आज भी विज्ञान के बजाए दर्शन पर ही आश्रित होना पड़ता है। क्योंकि उद्देश्य जीवन के दृष्टिकोण से जुड़ा प्रश्न है और यह दृष्टिकोण एवं दर्शन पर ही आधारित होता है। अतः उद्देश्य निर्धारण में विज्ञान अपने को असहाय और अक्षम महसूस करता है। शिक्षा और दर्शन की इसी निकटता के कारण शैक्षिक दर्शन का संप्रत्यय विकसित हुआ है। इस संबंध में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का कथन उल्लेखनीय है कि कर्म विचारों के गर्भ में पकते हैं। जैसे विचार होंगे, उसी तरह की गतिविधि मनुष्य अपनाता है। इसलिए जो अपनी गतिविधि को सफल और सार्थक बनाना चाहते हैं, उन्हें प्रथमतः अपनी विचार प्रक्रिया से अवगत होना पड़ेगा, तभी वह अपने प्रयास को सफल और सार्थक बना सकता है।