पंिडत दीनदयाल उपायाय जी के ारा ितपािदत एकाम मानव दशन म विणत शैिक िवचार क! वतमान समय म उपादेयता

Authors

  • िनिध राय अिस%टट ोफेसर िशाशा) िदि*वजय नाथ %नातको,र महािव.ालय, गोरखपुर उ,र देश Author

Keywords:

एकाIम मानववाद, सिप-लाकार मंडलाकृित, पुSषाथ

Abstract

सह वष क     परतंता का दंश झेलने के पात नव वत भारत को ऐसे िसांत क     आवयकता थी जो उसके:ाचीन
गौरवशाली अतीत क     आधारिशला पर समृिशाली भारत का िनमा.ण कर सके।अपनी बौिक संपदा के संर1ण के साथ ही
2यि3 एवं रा56 को एक सू म8 िपरो सके। यह काय. िश1ा 9ारा िकया जा सकता था परंतु िश1ा नीित.िनयंता भी उसी हीन भावना
के िशकार थे जो अंयेजढ ने भारतीयढ म8 भर दी थी। पत्ररणामवझप मैकाले 9ारा दी गई िश1ा पित को ही अपनाया गया और
भारतीय संकृितए परंपरा क     पूण. झप से अवहेलना हठई। िजसका दु5पत्ररणाम हम आज भी भुगत रहे हब्ए जब हम पिमी देशढ के
अनुगामी बनकर रह गए हब्। यिद हम8 अपनी:ाचीन:ितक्ा पुनः हािसल करनी है तो हमारी िश1ा पित को हमारे:ाचीन आदश
पर आधात्ररत करना होगा। अतः वत.मान भारत रा56 के उथ्जवल भिव5य के िलए एक ऐसे वैचात्ररक दश.न क     आवयकता है जो
रा56ीय पत्ररवेश के सव.था अनुकूलए सामािजक पत्ररवत.न क     ळिभ् से लाभकारी तथा रा56 को परम वैभव तक पहठंचाने म8 समथ. हो।
हमारे पास वह वैचात्ररक धरोहर एकाप्म मानव दश.न के झप म8 संकिलत है। पं० दीनदयाल उपाज्ञयाय जी 9ारा:ितपािदत एकाप्म
मानव दश.न शास्त जीवन मूडयढ पर आधात्ररतए मानव:वृिछयढ का सूव्म सार एवं संपूण. मानव को सुख समृि के माग. पर ले
जाने वाला शास्त दश.न है। इस दश.न के आधार पर नए समाज क     रचना क     आवयकता आज सव.था महसूस क     जा रही है।

References

Published

2023-09-29