सनातनी ज्ञान परिंपराए आिुमनक मवज्ञान और जलवार्ु पररवतयन

Authors

  • िॉ अचिना शत्रपाठी अरशिन्द मशहला कॉलेजए पटना Author

Keywords:

जलिायु पररितिनए पयाििरण संकटए पारम्पररक पाररशस्थशतक ज्ञान

Abstract

पयाििरण हमारा अनमोल शनशध है। सनातनी ज्ञान परंपरा ने प्रकृशत के बारे में गुरुओं के द्वारा ज्ञान का भंिार हमें दें रखा है। पर हम उनके ज्ञान से लाभ नहीं लेए उसे भूल अपने ही दुश्मन बन बैठे हैंए अपने व्यिहार के कारण। पयाििरण हमारे शमत्र हैं। इन्होंने हमें क्या शदया और आज हम इन्हें क्या दे रहे हैं । मनुष्य स्िाथी बन क्या कर रहा हैघ् शबना शिचारे िह अपने भशिष्य को सोचे शबना अपने ही शिनाश को शनमंत्रण देता है अपने कमों से। अपने कतिव्यों को भूल िह कहाुँ चूक करता जा रहा हैए हमें इसपर गंभीरता से सोचना होगा। शनिारण ढूंढना होगा। नहीं तो हम अपने अशन???? के भागी स्ियं बनेंगे ।
आधुशनक पयाििरण संकट एक िैशश्वक मु????ा हैए जो दुशनया की आबादी को अलग.अलग बेहद प्रभाशित करता है। जलिायु पररितिन के प्रशतकूल प्रभाि से शनपटने के शलए अनुकूलन रणनीशतयों की स्थापना की जानी चाशहए। जलिायु पररितिन के अनुकूल होने के शलए शिशभन्न स्थानीय समुदायों द्वारा उपयोग की जाने िाली अनुकूलन रणनीशतयों में पारंपररक पाररशस्थशतक ज्ञान प्रणाली भी शाशमल है। इसशलएए इस समीक्षा का समग्र उ????ेश्य जलिायु पररितिन अनुकूलन में पारंपररक पाररशस्थशतक ज्ञान की भूशमका का आकलन करना है। भारतीय ज्ञान एक ऐसा ज्ञान हैए शजसे पीढ़ी दर पीढ़ी और कलाए शशल्प और समारोहों जैसे सांस्कृशतक अशभव्यशियों के माध्यम से मौशखक रूप से संरशक्षत और हस्तांतररत शकया गया है। प्राकृशतक संसाधन प्रबंधन में इसकी बहुत बडी भूशमका है जो स्थानीय लोगों की जलिायु पररितिन के प्रशतकूल प्रभाि के शलए अनुकूलन क्षमता को बढ़ाती है। दूसरी ओरए यह उनके आस.पास उपलब्ध शिशभन्न तकनीकों का उपयोग करके शनकट और दीर्िकाशलक जलिायु पररितिन का पूिािनुमान लगाने में भी महत्िपूणि है। जलिायु पररितिन के प्रभाि को अनुकूशलत करने के शलए पारंपररक पाररशस्थशतक ज्ञान और िैज्ञाशनक ज्ञान को एकीकृत करना बहुत महत्िपूणि है। इसशलएए दुशनया भर में अभ्यास के रूप में स्थानीयए राष्रीय और अंतरािष्रीय स्तर पर पारंपररक पाररशस्थशतक ज्ञान को मान्यता देना महत्िपूणि है।

References

Published

2024-09-30